दरार
मेरा दुख उधार का कोट पहने रहता हैऔर बारिश में भी मेरा नाम पहचानता है।मैं उससे जाने को नहीं कहता।मैं उसके लिए एक बत्ती जलती छोड़ देता हूँ।
कुछ चीज़ें साफ़ टूटती हैं।कुछ वहाँ बदल जाती हैं जहाँ आख़िरकार रोशनी भीतर आती है।
मेरा दुख उधार का कोट पहने रहता हैऔर बारिश में भी मेरा नाम पहचानता है।मैं उससे जाने को नहीं कहता।मैं उसके लिए एक बत्ती जलती छोड़ देता हूँ।
कुछ चीज़ें साफ़ टूटती हैं।कुछ वहाँ बदल जाती हैं जहाँ आख़िरकार रोशनी भीतर आती है।