daraar.

मुक्त छंद2026

जब शामों में आराम ख़ुद के ही वक्ष का होजब तुकबंदी में कोई न मेरे पक्ष का हो जब सियाह रात में, किवाड़ पे कोई दस्तक न बजेआहट हो भी तो किसी तलबगार की हो ऐसे में क्यों,अतीत का बस्ता लिए कोई हमराह तलाशूँ

क्यों लिखूँ मैं नज़्में, ग़ज़लें, या कविता कोईजब इन्हें सुनने वाला कोई शख़्स न हो

~दरार