daraar.

मुक्त छंद

क्यों किसी को दें उम्मीदें झूठीक्यों किसी के मरहम बन जाएँदरार भी किसी का तलबगार था मगरउसने भी ज़ख़्म पर चीरे लगाए एहतियातन करता नहीं ऐतबार किसी परकरता है, मगर दिखाता नहीं इज़हार किसी परऐ ज़माने, क्यों न इस शब-ए-ग़म मेंअब हम-तुम एक हो जाएँ

~दरार