अब हर शाम फ़क़त काम में बिताता हूँघर भी रास्तों में थोड़ा ठहर के जाता हूँनोचती हैं उस मकान की दीवारें मुझकोरोज़ एक खिड़की से कूद कर नए जहान में जाता हूँ
~दरार
अब हर शाम फ़क़त काम में बिताता हूँघर भी रास्तों में थोड़ा ठहर के जाता हूँनोचती हैं उस मकान की दीवारें मुझकोरोज़ एक खिड़की से कूद कर नए जहान में जाता हूँ
~दरार