ग़म-ए-मौसम गुज़ारे गुज़रता नहींये मन, उदासियों से भी भरता नहींमैंने सोचा था, शहर-ए-हमनवा से दूर चला जाऊँगापर उसके बिन, ये शहर भी अच्छा लगता नहीं कमरे की खिड़की की ओर देख के सोचता हूँइसके बिना, नज़ारों का कोई वजूद नहींचंद फैली किताबें, दिख रही हैं दराज़ मेंपर इनको सँभालने वाला, घर ही नहीं
और फिर सवाल ये भी हैकि हम घर बदले भी या नहींएक अरसे बाद खोली मैंने डायरी मेरीउसमें एक शख़्स था, पर मैं नहीं
~दरार