न जाने कैसा अज़ाब है हर तरफ़ छायाआँखों में एक बार फिर उदासी ने घर है बसायाकैसे निकलूँ इस दल दल से मैं दरारक्यों तूने इसमें अपना घर बनाया
~दरार
न जाने कैसा अज़ाब है हर तरफ़ छायाआँखों में एक बार फिर उदासी ने घर है बसायाकैसे निकलूँ इस दल दल से मैं दरारक्यों तूने इसमें अपना घर बनाया
~दरार