उठेंगे किसी रोज़ हम भी अपने शाने सेखिलेगी धूप फिर एक दफ़ा हमारे मुस्कुराने से जो गुज़र रहा है हम पे वो देख लेते हैंशायद बहार आएगी एक दफ़ा फिर तेरे आने से रातों को मचलती बेचैनियाँ बरक़रार हैंक्या शिकायतें करनी, रोज़ के मैख़ाने से
~दरार
उठेंगे किसी रोज़ हम भी अपने शाने सेखिलेगी धूप फिर एक दफ़ा हमारे मुस्कुराने से जो गुज़र रहा है हम पे वो देख लेते हैंशायद बहार आएगी एक दफ़ा फिर तेरे आने से रातों को मचलती बेचैनियाँ बरक़रार हैंक्या शिकायतें करनी, रोज़ के मैख़ाने से
~दरार