daraar.

नज़्म

हम भी अच्छे भले ठीक थेग़म थे, मगर उनमें शरीक थे तू ने क्योंउम्मीदों के मशाल को हवा दीजज़्बातों की गर्मी दे करएक झटके में फूँक के बुझा दी

अब आलम ये हैकि ग़म भी ग़ैर लगने लगे हैंहर मंज़रख़ंजर लगने लगा है एक दफ़ा फिरसेआँखों में नींद कम हैइस बंजर सतह परआँसू घर करने लगा है

~दरार