हवाओं की तिश्नगी है शमा को बुझाने की,मुसाफ़िर क्या करें जब सिर्फ़ मशालों का सहारा हो।ऐसे में उमीदों का जनाज़ा भी लाज़मी था,मंज़िलों का क्या, जब अज़्म ही बे-ज़ार हो जाए।
~दरार
हवाओं की तिश्नगी है शमा को बुझाने की,मुसाफ़िर क्या करें जब सिर्फ़ मशालों का सहारा हो।ऐसे में उमीदों का जनाज़ा भी लाज़मी था,मंज़िलों का क्या, जब अज़्म ही बे-ज़ार हो जाए।
~दरार