daraar.

मुक्त छंद

रफ़ाक़तों की शामें यूँ न ज़ाया करजब तलक ताल्लुक़ है, कुछ तो कर ग़लत फ़हमी न पाल उम्र भर के रिश्तों कीबदचलन ज़माना है, अपने लिए कर कोई बेवफ़ा निकला तो रोता क्यों हैये न सोच कि ज़माने में ऐसा होता क्यों है

~दरार