रह जाओ मेरे क़रीब तुमजाने की बात न करोगुज़ारो शामें यूँही बैठे हुएमुस्कुराने की बात न करो चाहतों का मंज़रमहज़ आब-ए-तकलीफ़ हैगुफ़्तगू करो रात भरआदतों की बात न करो
बहकते दिलों की जुस्तजू मेंग़म-ए-दास्ताँ भी बता देनातुम चाहे मन मर्ज़ी करनापर वस्ल की बात मत करो तुम्हारे ग़मों की कश्ती मेंमैं शरीक न हो पाऊँगातुम समझोगी इश्क़ मगरमैं महज़ अफ़साना बतलाऊँगा