daraar.

शेर

छोड़ के अपने लुत्फ़ सारेसियाह रात की ओर चल पड़ेरख के सारे शौक़ परेबैरागी बन के चल पड़े ढूँढे थे हमने भी बहाने कईमरासिम के भी एक ज़माने मेंहवाएं कुछ ऐसी बदलींहम तर्क-ए-ताल्लुक़ की ओर चल पड़े

लिख रहे थे खूबसूरतीचाँद की हम हर दफ़ेअब जब भी उस ओर नज़र उठेहमको महज़ सिर्फ दाग़ दिखे बदल गया है मुसाफ़िर इतनागुज़रते गुज़रते इन शहरों सेअब खुद से ही सवाल करेकिस लिए निकले थे,किस ओर है चल पड़े?

~दरार