ये क्या है कि जो हर शाम, तारों को तू देखता हैयूँही बैठा बातें करता, आप बीती पे मलाल करता है कर सकता है बहुत कुछ, हुनर निखार सकता हैलेकिन तेरी अना है ऐसी, तू महज़ ख़्वाब देखता है लहू लुहान फिरता हुआ, अपना क़ातिल खोजता हैउफ़ ये तेरा शायराना अंदाज़, तुझे हर बार कू-ए-जाँ में धकेलता है
ये तेरी आदतें हैं और कुछ भी नहीं है दरारये तू ही है कि जो माज़ी को मुसलसल कुरेदता है
~दरार