अब मेरी यादों में कोई बसर नहीं करता हैमिलता हर किसी से हूँ रोज़, मगर असर नहीं करता हैदिल की हिकायतें कहने का मन नहीं हैऔर ज़ख़्म सहने का अब तन नहीं है जागता हूँ रातों को, मुसाफ़िर बना फिरता हूँजी रहा हूँ ऐसे ही, ख़्वाबों को कोसा करता हूँजाने क्या से क्या बन गया है आकार मेराज़िंदा दिली से न अब कोई भी व्यापार मेरा
लेकिन अभी भी जल रहे हैं चराग़ मद्धम मद्धमजो इसे बुझा सके ऐसी हवा की ओर देखता हूँऔर लग रहा है शायद सुकूत में है सुकूनये मेल मुलाक़ात कुछ भी नहीं बस तबाह होने का सलीक़ा है
~दरार