daraar.

शेर2026

बहुत आसान था, लबों तक जाम को लानापर हमने, सिर्फ़ तेरा नूर मुनासिब रखा और अब जब जलती जाती है, सारी महफ़िल-ए-रब्ततब भी, हमने महज़ तेरा नाम महफ़ूज़ रखा इल्ज़ाम लगता है, तुझसे की रुसवाई काजो हुआ ही नहीं, हर बात पर क्यों वो अज़ाब रखा

रूह पूछती है मुझसे मेरी जहाँकभी कोई रहा ही नहीं फिर क्योंवो मकान तूने वीरान रखा कैसी आदतें तू ने पाल ली हैं दरारकिसी ने महज़ हाल पूछाऔर तू ने फिर से वही अफ़साना रखा

~दरार